Friday, April 9, 2010

टूटी हुई चप्पल




एक थे मगन लाल शर्मा जी और एक थी उनकी चप्पल.
मगन लाल जी जब मोहल्ले भर के लिए मग्गू हुआ करते थे, तुतलाकर बोलते थे और फटा हुआ नेकर पहनते थे, तब उनके पैरों मैं चप्पल नहीं हुआ करती थी. जब वो स्लेट पर चाक घिसकर 'अ-आ-इ-ई' लिखने लगे, तब पैरों में रंग-बिरंगी नन्हीं सी चप्पल भी आ गई. मग्गू से वो मगन हो primary स्कूल पहुंचे तो चप्पल के आकार में भी कुछ वृद्धि हो गयी. मगन जी पढ़ते गए, बढ़ते गए और चप्पल भी मोटे तले वाली, मजबूत पट्टियों वाली, ज्यादा ओजस्वी और ज्यादा उर्जावान होती गयी. मगन जी की मसें भीगीं तो चप्पल भी धारीदार हो गयी. मगन जी में बड़प्पन आया तो चप्पल भी धीर-गंभीर हो गयी और मगन जी जब दूल्हा बने तो चप्पल का भी वह रूप था 
की मगन जी जितना खुद पे मोहित होते, चप्पल भी खुद पे उतनी ही रीझी जाती. पर समय का फेर मगन जी M. L. Sharma हो गए. रोजगार के लिए कितने ही शहरों, दफ्तरों और कुर्सियों के चक्कर उन्होंने लगाये और तब तक उत्तरोत्तर प्रगति को अग्रसर चप्पल अब दिन-प्रतिदिन घिसने लगी. चप्पल के जिस मोटे तले की वजह से मगन जी स्वयं को दूसरों से कई बालिश्त ऊपर महसूस करते थे, वो इतना घिस गया की उन्हें आस-पड़ोस, नाते-रिश्तेदार और दोस्त-यार अपने से दो हाथ ऊँचे लगने लगे. पहले-पहल तो मगन जी को बहुत बुरा लगा और खीझ मिटाने को वो अकेले मैं रोये भी पर धीरे-धीरे उन्हें इसकी आदत हो गयी और जब आखिरकार उनकी नौकरी स्कूल में मास्टर की लगी, तब तक वो घिसी हुई चप्पल के खूब आदी हो चुके थे और कभी तो बिना चप्प्पल वालों को देखकर हंस भी लेते थे. जिस दिन मगन जी के यहाँ पहला बच्चा हुआ और जिस दिन पहला वेतन हाथ आया, मगन जी ने चप्पल को रगड़-रगड़ कर चमकाया, पर बच्चे का नामकरण होते -होते और मास का आखिरी सप्ताह आते आते चप्पल की चमक पुनः धूमिल हो गई. जब मगन जी नौकरी की धकापेल और घर-परिवार की जिम्मेदारियों के बीच सामंजस्य बनाने का प्रयास कर रहे थे, चप्पल भी अपनी कमजोर पड़ती पट्टिओं को घिसे हुए तले के साथ व्यवस्थित कर रही थी. और फिर एक दिन जब प्रिसिपल ने मगन जी को कमरे मैं बुलाकर किसी बात पर डांट पिलाई, चप्पल तड़क कर के टूट गयी. उसके बाद तो चप्पल न जाने कितनी वजहों से, कितनी जगह से, कितनी बार टूटी और हर बार चूंकि काम तो चलाना ही था, इसलिए उसमें न जाने कितनी तरह के पैबंद लगे. हर मास की पहली तारीख, वेतन हाथ में और एक नया पैबंद चप्पल पर, पर मास बीतते-बीतते न जाने कितनी और जगह से चप्पल के धागे खुल जाते. इसी तरह दिन कटते थे और समझ न आता था की पता नहीं पहले मगन जी जिंदगी से हारेंगे या उनकी चप्पल. चप्पल न होती तो मगन जी नंगे पैरों वाले संत हो जाते, पर चप्पल थी, बदस्तूर थी...या अब सिर्फ पैबंद थे. 
खैर एक दिन मगन जी स्कूल जाते-जाते रास्ते मैं भीड़ देख ठहर गए. साईकिल खड़ी कर कुछ उचक कर देखा तो जाना किसी नेता की सभा हो रही है. लम्बा-तगड़ा सा नेता, बदन पर रेशमी खद्दर का कुरता-पायजामा, नेहरु जॉकेट और पैरों मैं सुन्दर जूतियाँ. भाषण बढ़ता विदेशी निवेश, चढ़ता शेयर बाजार, multiplex, nano कार आदि.....यानी कुल मिलकर देश के खुशहाल हालात और इस वजह से जनता के वोट पर बनने वाले सुन्दर जूतियों वाले नेता के हक़ के बारे मैं था.
मगन जी को यह सब सुनकर बहुत गुस्सा आया, अंग-अंग फड़कने लगा और मूंह से अस्फुट से अपशब्द निकलने लगे. जी में आया खींचकर चप्पल नेता के मूंह पर मार दें. पर....................चप्पल तो टूटी हुई थी. 

5 comments:

sonal said...

padh nahi paa rahe hain font sahi nahi aa raha

Dr Ankur Rastogi said...

सुधार कर दिया है.. धन्यवाद

Sonali Bhogle said...

Bahot Khub... :)
Go thr my blog also...
http://www.niceshayari-poems.blogspot.com/

वीना श्रीवास्तव said...

बहुत सही कहा है कभी-कभी लगता है जिंदगी हार रही है या चप्पल
अच्छी प्रस्तुति....
यहां भी जरूर आइए
http://veenakesur.blogspot.com/

anchal said...

bahut mast blog hai bhai...maza aa gaya
www.commjunc.blogspot.com

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कुछ न कहने से भी छिन् जाता है एजाज़-ए-सुख़न,
जुल्म सहने से भी जालिम की मदद होती है.

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