Thursday, November 1, 2012



उनसे राहत-ए-नज़र का रिश्ता है.
यह ना समझो जिगर का रिश्ता है.

रात कटती सनम के पहलू में,
खुदा से बस सहर का रिश्ता है.

जिसमें खुशबू हो रात-रानी सी,
समझो बस रात-भर का रिश्ता है.

इसमें बाकी है ऐतबार-ए-वफ़ा,
ज़रा कच्ची उमर का रिश्ता है.

वही रिश्ता है मेरा माँ तुमसे,
जो ख़ाक से शज़र का रिश्ता है.

3 comments:

GathaEditor Onlinegatha said...

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Priya Sharma said...

Nice lines ...
Thanks for sharing

Unknown said...

nice post.....
Thanks For Sharing

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कुछ न कहने से भी छिन् जाता है एजाज़-ए-सुख़न,
जुल्म सहने से भी जालिम की मदद होती है.

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