Sunday, September 27, 2009

फिर प्रतीक्षा




आज तेरी फिर प्रतीक्षा, कर रहा बेज़ार मन,
शोलों सी यह चिर प्रतीक्षा, और मेरा अंगार मन.


हुस्न ए सागर की प्रतीक्षा, अपने दिलवर की प्रतीक्षा,
अभी मिलन और फिर प्रतीक्षा, पतझड़ कभी बहार मन.


आहट तेरे तस्सवुर की, है आँखों में यह पानी सा,
रोने में माहिर प्रतीक्षा, अश्कों की बौछार मन.  

1 comments:

संजय भास्कर said...

बहुत सुन्दर रचना ।
ढेर सारी शुभकामनायें.

SANJAY BHASKAR
TATA INDICOM
HARYANA
http://sanjaybhaskar.blogspot.com

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कुछ न कहने से भी छिन् जाता है एजाज़-ए-सुख़न,
जुल्म सहने से भी जालिम की मदद होती है.

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