Thursday, September 24, 2009

बेकरारी अब भी




दिल पे जैसे कुछ नशा था, आँखों में खुमारी सी रही;
मिल गए तुम फिर भी हमको, बेकरारी सी रही.


कहना चाहूं तुम से ही बस, राज़-ए-दिल, राज़-ए-वफ़ा;
कह दिया सब, फिर भी जैसे पर्दादारी सी रही.


दिल में उसके प्यार था, पर आँख में दुनिया थी बसी;
अब जाना क्यूँ प्यार में उसके, दुनियादारी सी रही.


तब भी अपनी सी लगी, जब गैर की दुल्हन बनी;
कैसे उसे मानूं परायी, जो कल तक हमारी सी रही.


ए खुदा, मालिक मेरे, कर दे बस इतना करम,
अब उसे ही दवा बना, जो अब तक बीमारी सी रही.


2 comments:

संजय भास्कर said...

बहुत सुन्दर रचना । आभार

ढेर सारी शुभकामनायें.

SANJAY
http://sanjaybhaskar.blogspot.com

shyam1950 said...

priy Dr Ankur Rastogi

bunkar to aap khoob hain par darzi dheela hai

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कुछ न कहने से भी छिन् जाता है एजाज़-ए-सुख़न,
जुल्म सहने से भी जालिम की मदद होती है.

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